Saturday, 15 May 2021

दंड प्रक्रिया संहिता में भरण पोषण के प्रावधान

दंड प्रक्रिया संहिता में भरण पोषण के प्रावधान

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प्राचीन काल से ही प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य माना जाता रहा है कि वह अपने वृद्ध माता-पिता पत्नी एवं अवयस्क बच्चों का भरण पोषण करें। यह उसका व्यक्तिगत दायित्व है। मनु के अनुसार सौ  अपकार्य करते हुए भी अपने वृद्ध माता-पिता पत्नी एवं अवयस्क बच्चों का भरण पोषण किया जाना चाहिए। इसी प्रथा के अनुसार दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 से 128 तक में पत्नी अवयस्क बच्चे एवं माता-पिता के भरण-पोषण के संबंध में प्रावधान किया गया है।

 

v  अहमद अली बनाम ए बेगम 1952 के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित किया गया कि इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्ति को दंडित करना कभी नहीं रहा है और ना ही यह दंड की श्रेणी में आता है।

v  हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण पोषण अधिनियम 1956 की धारा 20 खंड (1) के अंतर्गत भी इस प्रकार की व्यवस्था की गई है इसके अनुसार इस धारा के उपबंध के अधीन रहते हुए कोई हिंदू अपने जीवन काल के अभ्यंतर अपने औरस या जारज संतान और दुर्बल जनकों का भरण पोषण करने के लिए बाध्य है।

v  धारा 125 के अनुसार निम्नलिखित व्यक्ति भरण पोषण प्राप्त करने के लिए हकदार है-

1.   पत्नी जो अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है,

2.   अवयस्क संतान चाहे वह औरस हो या जारज अथवा विवाहित हो या अविवाहित जो अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हों,

3.   विवाहित पुत्री से अन्यथा ऐसी औरस या जारज संतान जिसने वयस्कता प्राप्त कर ली हो लेकिन वह शारीरिक या मानसिक दुर्बलता के कारण भरण पोषण करने में असमर्थ है,

4.   माता-पिता जो अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है,

5.   ऐसी अवयस्क विवाहित पुत्री जो अपने पति से भरण-पोषण प्राप्त करने में असमर्थ हैं।

v  महेशचंद्र द्विवेदी बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश 2009 के मामले में कहा गया कि यदि विवाह विच्छेद पारस्परिक सहमति से हुआ है तब भी पत्नी भरण-पोषण पाने की हकदार तब तक है जब तक वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती है।

v  मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम एवं अन्य 1985 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि इस धारा के अंतर्गत शब्द पत्नी में तलाकशुदा पत्नी शामिल है जब तक कि वहां पुनर्विवाह नहीं कर लेती। प्रत्येक मुस्लिम पति अपनी तलाकशुदा पत्नी का भरण पोषण करने के लिए उत्तरदाई है। धारा 125 के प्रावधानों और मुस्लिम स्वीय विधि मैं कोई विरोधाभास नहीं है।

v  देवकी बनाम शशि भूषण 2013 के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह निर्धारित किया है कि पहली पत्नी को सक्षम न्यायालय की विवाह विच्छेद की डिक्री द्वारा तलाक दिए बिना दूसरा विवाह कर लिए जाने पर पहली पत्नी भरण-पोषण की हकदार होगी। पहली पत्नी की विवाह को शुन्य कहने मात्र से उसे शून्य नहीं माना जाएगा।

v  संगीता कुमारी बनाम स्टेट ऑफ़ झारखंड 2018 के मामले में निर्धारित किया गया है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत अंतरिम भरण पोषण प्राप्त करने वाली पत्नी हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के अंतर्गत निर्वाह भत्ता पाने की हकदार नहीं है।

v  अमोद कुमार श्रीवास्तव बनाम स्टेट ऑफ़ उत्तर प्रदेश 2009 के मामले में निर्धारित किया गया कि वयस्क पुत्र पुत्रियां अपने पिता से भरण-पोषण केवल तभी प्राप्त कर सकती है जब यह साबित कर दिया जाए कि वह शारीरिक या मानसिक अयोग्यता के कारण अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है।

v  मजिस्ट्रेट कब भरण पोषण का आदेश दे सकता है- यदि कोई व्यक्ति उक्त व्यक्तियों के भरण-पोषण की उपेक्षा करता है या भरण-पोषण से इनकार करता है और प्रथम श्रेणी का मजिस्ट्रेट ऐसे तथ्य से आश्वस्त हो जाता है तो ऐसे उपेक्षा करने वाले व्यक्ति को अपने माता-पिता पत्नी या अवयस्क बच्चों का भरण पोषण करने का आदेश दे सकेगा।


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v  केंद्र में संसद द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता संशोधन अधिनियम 2001 पारित कर भरण पोषण या अंतरिम भरण पोषण या प्रक्रिया खर्च के लिए तय की जाने वाली मासिक राशि के संबंध में यह निर्धारित किया गया है कि मजिस्ट्रेट जैसा उचित समझें उसी मासिक दर से भरण-पोषण या अंतरिम भरण-पोषण की राशि का निर्धारण कर सकता है इस संशोधन से पहले यह राशि ₹500 तक मासिक निर्धारित की गई थी परंतु अब यह असीमित है।

v  भरण पोषण या अंतरिम भरण-पोषण की राशि कब तक देर होगी-

1.   आदेश की दिनांक से

2.   आवेदन की दिनांक से देय होगी

v  मजिस्ट्रेट भरण पोषण या अंतरिम भरण पोषण के आवेदन पत्र का निराकरण अनावेदक ऐसी सूचना की तामील होने की तारीख से 60 दिन के भीतर करेगा इस प्रावधान को दंड प्रक्रिया संसोधन अधिनियम 2001 के द्वारा जोड़ा गया।

v  भरण पोषण के आदेश का अनुपालन नहीं किए जाने पर प्रक्रिया- यदि कोई व्यक्ति जिसे आदेश दिया गया हो उस आदेश का अनुपालन करने में पर्याप्त कारण के बिना असफल रहता है तो उस आदेश के प्रत्येक भाग के लिए ऐसा कोई मजिस्ट्रेट रकम को ऐसी रीति से उद्गृहीत किए जाने के लिए वारंट जारी कर सकता है जैसी रीति जुर्माने से उद्गृहीत करने के लिए उपबंधित है, और उस वारंट के निष्पादन के पश्चात प्रत्येक माह के न चुकाए गए पूरे भरण पोषण यह अंतरिम भरण-पोषण के भत्ते और कार्यवाही के खर्चे या उसके किसी भाग के लिए ऐसे व्यक्ति को एक माह तक की अवधि के लिए अथवा यदि वह उससे पूर्व चुका दिया जाता है तो चुका देने के समय तक के लिए कारावास का दंड आदेश दे सकता है।

v  परंतु इस धारा के अधीन किसी रकम की वसूली के लिए कोई वारंट तब तक जारी नहीं किया जाएगा जब तक कि उस रकम को उद्गृहीत करने के लिए उस तारीख से जिसको वहां देय हुई है, 1 वर्ष की अवधि के अंदर न्यायालय में आवेदन नहीं किया गया है

v  परंतु यहां और कि यदि ऐसा इस शर्त पर भरण पोषण करने की प्रस्थापना करता है कि उसकी पत्नी उसके साथ रहे और वहां पति के साथ रहने से इंकार करती है तो ऐसा मजिस्ट्रेट उसके द्वारा कथित इंकार के किन्हीं कारणों पर विचार कर सकता है और ऐसी प्रस्थापना के किए जाने पर भी वहां इस धारा के अधीन आदेश दे सकता है यदि उसका समाधान हो जाता है कि ऐसा आदेश देने के लिए न्याय संगत आधार है।

v  स्पष्टीकरण-यदि पति ने अन्य स्त्री से विवाह कर लिया है यार अखिल रखता है तो यह उसकी पत्नी द्वारा उसके साथ रहने से इंकार का न्याय संगत आधार माना जाएगा।

v  अजीज मोहम्मद बना सैयदा बेगम 1981 के मामले में निर्धारित किया गया कि पत्नी को उस दशा में जबकि उसका पति किसी अन्य स्त्री से दूसरा विवाह कर लेता है यह साबित करने की आवश्यकता नहीं होती कि पति द्वारा उसके भरण-पोषण से इनकार किया जा रहा है अथवा उपेक्षा की जा रही है ऐसी दशा में पत्नी अपने पति से पृथक रहते हुए भरण-पोषण का दावा कर सकती है।

v  कोई पत्नी अपने पति से इस आधार पर भरण पोषण प्राप्त करने की हकदार नहीं होगी यदि वहां जारता में रह रही है या यदि वहां पर्याप्त कारण के बिना अपने पति के साथ रहने से इंकार करती है या यदि वह पारस्परिक सहमति से पृथक रह रहे हैं। यदि उपर्युक्त में से कोई बात के सिद्ध हो जाती है तो मजिस्ट्रेट भरण पोषण के आदेश को रद्द कर सकेगा।

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v  125. पत्नी, सन्तान और माता-पिता के भरणपोषण के लिए आदेश –

 (1) यदि पर्याप्त साधनों वाला कोई व्यक्ति :

(क) अपनी पत्नी का, जो अपने भरणपोषण करने में असमर्थ है, या

(ख) अपनी धर्मज या अधर्मज अवयस्क सन्तान का चाहे विवाहित हो या न हो, जो अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है, या

(ग) अपनी धर्मज या अधर्मज संतान का (जो विवाहित पुत्री नहीं है), जिसने वयस्कता प्राप्त कर ली है, जहाँ ऐसी संतान किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता या क्षति के कारण अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है, या 

(घ) अपने पिता या माता का जो अपना भरणपोषण करने में असमर्थ हैं, भरणपोषण करने में उपेक्षा करता है, या भरणपोषण करने से इंकार करता है, तो प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट, ऐसी उपेक्षा या इंकार के साबित हो जाने पर, ऐसे व्यक्ति को यह निदेश दे सकता है कि वह अपनी पत्नी या ऐसी सन्तान, पिता या माता के भरणपोषण के लिए ऐसी मासिक दर पर, जिसे मजिस्ट्रेट ठीक समझे, मासिक भत्ता दे और उस भत्ते का संदाय ऐसे व्यक्ति को करे जिसको संदाय करने का मजिस्ट्रेट समय-समय पर निदेश दे

v  परन्तु मजिस्ट्रेट खण्ड (ख) में निर्दिष्ट अवयस्क पुत्री के पिता को निदेश दे सकता है कि वह उस समय तक ऐसा भत्ता दें जब तक वह वयस्क नहीं हो जाती है यदि मजिस्ट्रेट का समाधान हो जाता है कि ऐसी अवयस्क पुत्री के, यदि वह विवाहित हो, पति के पास पर्याप्त साधन नहीं हैं :

v  परन्तु यह और कि मजिस्ट्रेट, इस उपधारा के अधीन भरणपोषण के लिए मासिक भत्ते के संबंध में कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान, ऐसे व्यक्ति को यह निदेश दे सकता है कि वह अपनी पत्नी या ऐसी संतान, पिता या माता के अंतरिम भरणपोषण के लिए, जिसे मजिस्ट्रेट उचित समझे, मासिक भत्ता और ऐसी कार्यवाही का व्यय दे और ऐसे व्यक्ति को उसका संदाय करे जिसको संदाय करने का मजिस्ट्रेट समय-समय पर निर्देश दे :

v   परन्तु यह भी कि दूसरे परन्तुक के अधीन अंतरिम भरणपोषण के लिए मासिक भत्ते और कार्यवाही के व्ययों का कोई आवेदन, यथासंभव ऐसे व्यक्ति पर आवेदन की तामील की तारीख से साठ दिन के भीतर निपटाया जाएगा।

v  स्पष्टीकरण -- इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए :

(क) अवयस्कसे ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके बारे में भारतीय वयस्कता अधिनियम, 1875 (1875 का 9) के उपबंधों के अधीन यह समझा जाता है कि उसने वयस्कता प्राप्त नहीं की है;

(ख) पत्नीके अन्तर्गत ऐसी स्त्री भी है जिसके पति ने उससे विवाह-विच्छेद कर लिया है या जिसने अपने पति से विवाह-विच्छेद कर लिया है और जिसने पुनर्विवाह नहीं किया है।

(2) भरणपोषण या अंतरिम भरणपोषण के लिए ऐसा कोई भत्ता और कार्यवाही के लिए व्यय के आदेश की तारीख से या, यदि ऐसा आदेश दिया जाता है तो, यथास्थिति, भरणपोषण या अंतरिम भरणपोषण और कार्यवाही के व्ययों के लिए आवेदन की तारीख से संदेय होंगे ।

(3) यदि कोई व्यक्ति जिसे आदेश दिया गया हो, उस आदेश का अनुपालन करने में पर्याप्त कारण के बिना असफल रहता है तो उस आदेश के प्रत्येक भंग के लिए ऐसा कोई मजिस्ट्रेट देय रकम के ऐसी रीति से उद्गृहीत किए जाने के लिए वारण्ट जारी कर सकता है जैसी रीति जुर्माने उद्गृहीत करने के लिए उपबंधित है, और उस वारण्ट के निष्पादन के पश्चात् प्रत्येक मास के न चुकाए गए यथास्थिति भरणपोषण या अन्तरिम भरणपोषण के लिए पूरे भत्ते और कार्यवाही के व्यय या उसके किसी भाग के लिए ऐसे व्यक्ति को एक मास तक की अवधि के लिए, अथवा यदि वह उससे पूर्व चुका दिया जाता है। तो चुका देने के समय तक के लिए, कारावास का दण्डादेश दे सकता है:

परन्तु इस धारा के अधीन देय रकम की वसूली के लिए कोई वारण्ट तब तक जारी न किया जाएगा जब तक उस रकम को उद्गृहीत करने के लिए, उस तारीख से जिसको वह देय हुई एक वर्ष की अवधि के अंदर न्यायालय से आवेदन नहीं किया गया है

परन्तु यह और कि यदि ऐसा व्यक्ति इस शर्त पर भरणपोषण करने की प्रस्थापना करता है कि उसकी पत्नी उसके साथ रहे और वह पति के साथ रहने से इंकार करती है तो ऐसा मजिस्ट्रेट उसके द्वारा कथित इंकार के किन्हीं आधारों पर विचार कर सकता है और ऐसी प्रस्थापना के किए जाने पर भी वह इस धारा के अधीन आदेश दे सकता है यदि उसका समाधान हो जाता है कि ऐसा आदेश देने के लिए न्यायसंगत आधार है। 

v   स्पष्टीकरण -- यदि पति ने अन्य स्त्री से विवाह कर लिया है या वह रखैल रखता है तो यह उसकी पत्नी द्वारा उसके साथ रहने से इंकार का न्यायसंगत आधार माना जाएगा।

(4) कोई पत्नी अपने पति से इस धारा के अधीन यथास्थिति भरणपोषण या अन्तरिम भरणपोषण के लिए भत्ता और कार्यवाही के व्यय प्राप्त करने की हकदार न होगी, यदि वह जारता की दशा में रह रही है अथवा यदि वह पर्याप्त कारण के बिना अपने पति के साथ रहने से इंकार करती है अथवा यदि वे पारस्परिक सम्मति से पृथक् रह रहे हैं।

(5) मजिस्ट्रेट यह साबित होने पर आदेश को रद्द कर सकता है कि कोई पत्नी, जिसके पक्ष में इस धारा के अधीन आदेश दिया गया है जारता की दशा में रह रही है अथवा पर्याप्त कारण के बिना अपने पति के साथ रहने से इंकार करती है अथवा वे पारस्परिक सम्मति से पृथक् रह रहे हैं।

(6) जहाँ इस धारा के अधीन कार्यवाही में मजिस्ट्रेट को यह प्रकट हो कि भरण-पोषण का दावा कर रहा व्यक्ति उसके भरण-पोषण और कार्यवाही के आवश्यक खर्चे के लिए तत्काल अनुतोष की आवश्यकता में है, मजिस्ट्रेट उसके आवेदन पर से उस व्यक्ति को, जिसके कि विरुद्ध भरण-पोषण का दावा किया गया है, भरण-पोषण का दावा करने वाले व्यक्ति को कार्यवाही से लंबित रहने के दौरान ऐसी मासिक राशि जो कि पांच हजार रुपए से अनधिक हो और कार्यवाही के ऐसे खर्चे, जो मजिस्ट्रेट युक्तियुक्त समझे, का भुगतान करने के लिए आदेश दे सकेगा और ऐसा आदेश भरण-पोषण के आदेश की तरह लागू किए जाने योग्य होगा।


 

v  126. प्रक्रिया – 

(1) किसी व्यक्ति के विरुद्ध धारा 125 के अधीन कार्यवाही किसी ऐसे जिले में की जा सकती है :

(क) जहाँ वह है, अथवा

(ख) जहाँ वह या उसकी पत्नी निवास करती है, अथवा

(ग) जहाँ उसने अंतिम बार, यथास्थिति, अपनी पत्नी के साथ या अधर्मज संतान की माता के साथ निवास किया है।

(2) ऐसी कार्यवाही में सब साक्ष्य, ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति में, जिसके विरुद्ध भरणपोषण के लिए संदाय का आदेश देने की प्रस्थापना है, अथवा जब उसकी वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति दे दी गई है तब उसके प्लीडर की उपस्थिति में लिया जाएगा और उस रीति से अभिलिखित किया जाएगा जो समन मामलों के लिए विहित है :

परन्तु यदि मजिस्ट्रेट का समाधान हो जाए कि ऐसा व्यक्ति जिसके विरुद्ध भरणपोषण के लिए संदाय का आदेश देने की प्रस्थापना है, तामील से जानबूझकर बच रहा है अथवा न्यायालय में हाजिर होने में जानबूझकर उपेक्षा कर रहा है तो मजिस्ट्रेट मामले को एकपक्षीय रूप में सुनने और अवधारण करने के लिए अग्रसर हो सकता है और ऐसे दिया गया कोई आदेश उसकी तारीख से तीन मास के अन्दर किए गए आवेदन पर दर्शित अच्छे कारण से ऐसे निबंधनों के अधीन जिनके अन्तर्गत विरोधी पक्षकार को खर्चे के संदाय के बारे में ऐसे निबंधन भी हैं जो मजिस्ट्रेट न्यायोचित और उचित समझे, अपास्त किया जा सकता है।

(3) धारा 125 के अधीन आवेदनों पर कार्यवाही करने में न्यायालय को शक्ति होगी कि वह खर्चे के बारे में ऐसा आदेश दे जो न्यायसंगत है।

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v  127. भत्ते में परिवर्तन – 

(1) धारा 125 के अधीन भरणपोषण या अंतरिम भरणपोषण के लिए मासिक भत्ता पाने वाले या यथास्थिति, अपनी पत्नी, संतान, पिता या माता को भरणपोषण या अंतरिम भरणपोषण के लिए मासिक भत्ता देने के लिए उसी धारा के अधीन आदिष्ट किसी व्यक्ति की परिस्थितियों में तब्दीली साबित हो जाने पर, मजिस्ट्रेट यथास्थिति, भरणपोषण या अंतरिम भरणपोषण के लिए भत्ते में ऐसा परिवर्तन कर सकता है, जो वह ठीक समझे ।

(2) जहाँ मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि धारा 125 के अधीन दिया गया कोई आदेश किसी सक्षम सिविल न्यायालय के किसी विनिश्चय के परिणामस्वरूप रद्द या परिवर्तित किया जाना चाहिए वहाँ वह, यथास्थिति, उस आदेश को तद्नुसार रद्द कर देगा या परिवर्तित कर देगा।

(3) जहाँ धारा 125 के अधीन कोई आदेश ऐसी स्त्री के पक्ष में दिया गया है जिसके पति ने उससे विवाह विच्छेद कर लिया है या जिसने अपने पति से विवाह विच्छेद प्राप्त कर लिया है वहाँ यदि मजिस्ट्रेट का समाधान हो जाता है कि :

(क) उस स्त्री ने ऐसे विवाह-विच्छेद की तारीख के पश्चात् पुनः विवाह कर लिया है, तो वह ऐसे आदेश को उसके पुनर्विवाह की तारीख से रद्द कर देगा;

(ख) उस स्त्री के पति ने उससे विवाह-विच्छेद कर लिया है और उस स्त्री ने उक्त आदेश के पूर्व या पश्चात् वह पूरी धनराशि प्राप्त कर ली है जो पक्षकारों को लागू किसी रूढ़िजन्य या स्वीय विधि के अधीन ऐसे विवाह-विच्छेद पर देय थी तो वह ऐसे आदेश को :

 (i) उस दशा में जिसमें ऐसी धनराशि ऐसे आदेश से पूर्व दे दी गई थी उस आदेश के दिए जाने की तारीख से रद्द कर देगा;

 (ii) किसी अन्य दशा में उस अवधि की, यदि कोई हो, जिसके लिए पति द्वारा उस स्त्री को वास्तव में भरणपोषण दिया गया है, समाप्ति की तारीख से रद्द कर देगा;

(ग) उस स्त्री ने अपने पति से विवाह-विच्छेद प्राप्त कर लिया है और उसने अपने विवाह-विच्छेद के पश्चात् अपने यथास्थिति भरणपोषण या अंतरिम भरणपोषण के अधिकारों का स्वेच्छा से अभ्यर्पण कर दिया था, तो वह आदेश को उसकी तारीख से रद्द कर देगा।

(4) किसी भरणपोषण या दहेज की, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जिसे धारा 125 के अधीन भरण पोषण और अन्तरिम भरणपोषण या उनमें से किसी के लिए कोई मासिक भत्ता संदाय किए जाने का आदेश दिया गया है वसूली के लिए डिक्री करने के समय सिविल न्यायालय उस राशि की भी गणना करेगा जो ऐसे आदेश के अनुसरण में यथास्थिति भरण पोषण या अंतरिम भरणपोषण या इनमें से किसी के लिए मासिक भत्ते के रूप में उस व्यक्ति को संदाय की जा चुकी है या उस व्यक्ति द्वारा वसूल की जा चुकी है।

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v  128. भरणपोषण के आदेश का प्रवर्तन -- यथास्थिति भरणपोषण या अंतरिम भरणपोषण और कार्यवाही के व्ययो के आदेश की प्रति, उस व्यक्ति को, जिसके पक्ष में वह दिया गया है या उसके संरक्षक को, यदि कोई हो, या उस व्यक्ति को, जिसे यथास्थिति भरणपोषण के लिए भत्ता या अन्तरिम भरणपोषण के लिए भत्ता और कार्यवाही के लिए व्यय दिया जाना है निःशुल्क दी जाएगी और ऐसे आदेश का प्रवर्तन किसी ऐसे स्थान में, जहाँ वह व्यक्ति है, जिसके विरुद्ध वह आदेश दिया गया था, किसी मजिस्ट्रेट द्वारा पक्षकारों को पहचान के बारे में और यथास्थिति देय भत्तों या व्ययो के न दिए जाने के बारे में ऐसे मजिस्ट्रेट का समाधान हो जाने पर किया जा सकता है।

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भारतीय संविधान के अंतर्गत हिंदी भाषा के प्रावधान (Constitution of India)

भारतीय संविधान के अंतर्गत हिंदी भाषा के प्रावधान

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भारतीय संविधान के अंतर्गत हिंदी भाषा के संबंध में प्रावधान अध्याय 17 अनुच्छेद 343 से 351 तक तथा अनुसूची 8 में दिए गए हैं। आठवीं अनुसूची संविधान के अनुच्छेद 344 (1) और 351 से संबंधित है। इस अनुसूची में मूल संविधान के निर्माण के समय 14 भाषाओं को शामिल किया गया था वर्तमान में इसमें 22 भाषाएं शामिल है 14 भाषाओं के अंतर्गत असमिया, बंगला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मराठी, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगू, उर्दू भाषाओं को शामिल किया गया। 15 वी के रूप में सिंधी को जोड़ा गया जो 21 से संविधान संशोधन अधिनियम 1967 (10/4/1967) के द्वारा जोड़ा गया। 16वीं 17वीं और 18वीं भाषा के रूप में कोकणी मणिपुरी और नेपाली 3 भाषाओं को जोड़ा गया जो 71 वा संविधान संशोधन अधिनियम 1992 (31/8/1992) के द्वारा जोड़ा गया। तत्पश्चात 92 वां संविधान संशोधन अधिनियम 2003 (7/1/2004) के द्वारा 4 भाषाओं को शामिल किया गया जो बोडो डोंगरी संथाली और मैथिली है। इस प्रकार आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को जोड़ा गया। आठवीं अनुसूची के अंतर्गत अंग्रेजी भाषा का उल्लेख नहीं है। 96 वा संविधान संशोधन अधिनियम 2011 (23 सितंबर 2011) को उड़िया भाषा का नाम बदलकर ओडिया कर दिया गया।

भारतीय संविधान के प्रमुख अनुच्छेद 343 से लेकर 351 तक हिंदी भाषा के प्रयोग के संबंध में प्रावधान दिए गए हैं। इसी के साथ राजभाषा आयोग और राजभाषा समिति संबंधी प्रावधान भी बताए गए हैं अनुच्छेद 343 से 351 तक की विस्तृत विवेचना इस प्रकार है:-

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भाग 17

राजभाषा

अध्याय 1 – संघ की भाषा

343. संघ की राजभाषा

(1) संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप होगा  

(2) खंड (1) में किसी बात के होते हुए भी, इस संविधान के प्रारंभ से 15 वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था :

परन्तु राष्ट्रपति उक्त अवधि के दौरान, आदेश द्वारा, संघ के शासकीय प्रयोजनों में से किसी के लिए अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिन्दी भाषा का और भारतीय अंकों के अंतरराष्ट्रीय रूप के अतिरिक्त देवनागरी रूप का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा

(3) इस अनुच्छेद किसी बात के होतेते हुए भी, संसद् उक्त 15 वर्ष की अवधि के पश्चात, विधि द्वारा

() अंग्रेजी भाषा का, या 

() अंकों के देवनागरी रूप का, ऐसे
प्रयोजनों के लिए प्रयोग उपबंधित कर सकेगी जो ऐसी विधि में विनिर्दिष्ट की जाएं

 

344. राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद् की समिति

(1) राष्ट्रपति, इस संविधान के प्रारंभ से पांच वर्ष की समाप्ति पर और तत्पश्चात ऐसे प्रारंभ से दस वर्ष की समाप्ति पर, आदेश द्वारा, एक आयोग गठित करेगा जो एक अध्यक्ष और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट विभिन्न भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले ऐसे अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा जिनको राष्ट्रपति नियुक्त करे और आदेश में आयोग द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रकिया परिनिश्चित की जाएगी

(2) आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह राष्ट्रपति को –

(संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए हिन्दी भाषा के अधिकाधिक प्रयोग,

(संघ के सभी या किन्हीं शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग पर निर्बंधनो,

(अनच्छद 348 में उल्लिखित सभी या किन्हीं प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा,

(संघ के किसी एक या अधिक विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए प्रयोग किए जाने वाले अंकों के रूप,

(संघ की राजभाषा तथा संघ और किसी राज्य के बीच या एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच पत्रादि की भाषा और उनके प्रयोग के संबंध में राष्ट्रपति द्वारा आयोग को निर्देशित किए गए किसी अन्य विषय के बारे में सिफारिश करें।

(3) खंड (2) के अधीन अपनी सिफारिशें करने मेंआयोग भारत की औद्योगिकसांस्कृतिक और वैज्ञानिक उन्नति का और लोक सेवाओं के संबंध में अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के व्यक्तियों के न्यायसंगत दावों और हितों का सम्यक ध्यान रखेगा 

(4) एक समिति गठित की जाएगी जो तीस सदस्यों से मिलकर बनेगी जिनमें से बीस लोक सभा के सदस्य होगे और दस राज्य सभा के सदस्य होगे जो क्रमशः लोक सभा के सदस्यों और राज्य सभा के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित होंगे

(5) समिति का यह कर्तव्य होगा कि वह खंड (1) के अधीन गठित आयोग की सिफारिशों की परीक्षा करें और राष्ट्रपति को उन पर अपनी राय के बारे में प्रतिवेदन दें।

(6) अनुच्छेद 342 में किसी बात के होते हुए भी राष्ट्रपति खंड (5) में निर्दिष्ट प्रतिवेदन पर विचार करने के पश्चात उस संपूर्ण प्रतिवेदन के या उसके किसी भाग के अनुसार निर्देश दे सकेगा।

345. राज्य की राजभाषा या राजभाषाएं

अनुच्छेद 346 और अनुच्छेद 347 के उपवन 2 के अधीन रहते हुए किसी राज्य का विधान मंडल विधि द्वारा उस राज्य में प्रयोग होने वाली भाषाओं में से किसी एक या अधिक भाषाओं को या हिंदी को उस राज्य के सभी या कि नहीं शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा या भाषाओं के रूप में अंगीकार कर सकेगा।

परंतु जब तक राज्य का विधान मंडल विधि द्वारा अन्यथा उपबंध ना करें तब तक राज्य के भीतर उन शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था।

 

346. एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच या किसी राज्य और संघ के बीच पत्रादि की राजभाषा-

संघ में शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग किए जाने के लिए तत समय प्राधिकृत भाषा एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच तथा किसी राज्य और संघ के बीच पत्रादि की राजभाषा होगी

 परंतु यदि दो या अधिक राज्य यह करार करते हैं कि उन राज्यों के बीच पत्रादि की राजभाषा हिंदी भाषा होगी तो ऐसे पत्र आदि के लिए उस भाषा का प्रयोग किया जा सकेगा।


347. किसी राज्य की जनसंख्या के किसी अनुभाग द्वारा बोली जाने वाली भाषा के संबंध में विशेष उपबंध-

यदि इस निमित्त मांग किए जाने पर राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि किसी राज्य की जनसंख्या का पर्याप्त भाग यहां जाता है कि उसके द्वारा बोली जाने वाली भाषा को राज्य द्वारा मान्यता दी जाए तो वह निर्देश दे सकेगा कि ऐसी भाषा को भी उस राज्य में सर्वत्र या उसके किसी भाग में ऐसे प्रयोजनों के लिए जो वह विनिर्दिष्ट करें शासकीय मान्यता दी जाए।


अध्याय 3

उच्चतम न्यायालय उच्च न्यायालय आदि की भाषा

 348. उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और अधिनियम विधि को आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा-

(1) इस भाग के पूर्व गमी उप बंधुओं में किसी बात के होते हुए भी जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध ना करे तब तक

() उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाही या अंग्रेजी भाषा में होगी

() (i) संसद् के प्रत्येक सदन या किसी राज्य के विधान मंडल के सदस्य प्रत्येक सदन में पुनर स्थापित किए जाने वाले सभी विधायकों या प्रस्तावित किए जाने वाले सभी संशोधनों के 

(ii) संसद् या किसी राज्य के विधान मंडल द्वारा पारित सभी अधिनियम ओके और राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित सभी अध्यादेशों के और

(iii) इस संविधान के अधीन अथवा संसद या किसी राज्य के विधान मंडल द्वारा बनाए गए किसी विधि के अध्ययन निकाले गए या बनाए गए सभी आदेशों नियमों नियमों और उप विधियों के प्राधिकृत पाठ अंग्रेजी भाषा में होंगे।

(2) खंड (1) के उपखंड () में किसी बात के होते हुए भी किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उच्च न्यायालय की कार्यवाही ओं में जिसका मुख्य स्थान उस राज्य में है हिंदी भाषा का या उस राज्य के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाने वाली अन्य भाषा का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा।

परंतु इस खंड की कोई बात ऐसे उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए किसी निर्णय डिक्री या आदेशों को लागू नहीं होगी।

(3) खंड (1) के उपखंड () में किसी बात के होते हुए भी जहां किसी राज्य के विधान मंडल ने उस विधानमंडल में पुनर्स्थापित विधायकों में या उसके द्वारा पारित अधिनियम में अथवा उस राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित आदेशों में अथवा उस उपखंड के पैरा तीन में निर्दिष्ट किसी आदेश नियम विनियम या उपविधि के प्रयोग के लिए अंग्रेजी भाषा से बिना कोई भाषा होती है वहां उस राज्य के राजपत्र में उस राज्य के राज्यपाल के प्राधिकार से प्रकाशित अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद इस अनुच्छेद के अधीन उसका अंग्रेजी में प्राधिकृत पाठ समझा जाएगा।

 

349. भाषा से संबंधित कुछ विधियां अधिनियमित करने के लिए विशेष प्रक्रिया-

इस संविधान के प्रारंभ से 15 वर्ष की अवधि के दौरान अनुच्छेद 348 के खंड (1) में उल्लिखित किसी प्रयोजन के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा के लिए उपबंध करने वाला कोई विदेशिया संशोधन संसद के किसी सदन में राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी के बिना पुनर्स्थापित यह प्रस्तावित नहीं किया जाएगा और राष्ट्रपति किसी ऐसे विधायक को पुनर्स्थापित या किसी ऐसे संशोधन को प्रस्तावित किए जाने की मंजूरी अनुच्छेद 344 के खंड (1) के अधीन गठित आयोग की सिफारिश पर और उस अनुच्छेद के खंड (4) के अधीन गठित समिति के प्रतिवेदन पर विचार करने के पश्चात ही देगा अन्यथा नहीं।


अध्याय 4

विशेष निर्देश

350. व्यथा के निवारण के लिए अभ्यावेदन में प्रयोग की जाने वाली भाषा-

प्रत्येक व्यक्ति किसी व्यथा के निवारण के लिए संज्ञा राज्य के किसी अधिकारी या प्राधिकारी को यथास्थिति संघ में या राज्य में प्रयोग होने वाली किसी भाषा मे अभ्यावेदन देने का हकदार होगा।

 

350. प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएं-

प्रत्येक राज्य और राज्य के भीतर प्रतीक स्थानीय प्राधिकारी भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के बालकों को शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था करने का प्रयास करेगा और राष्ट्रपति किसी राज्य को ऐसे निर्देश दे सकेगा जो वह ऐसी सुविधाओं का उपबंध सुनिश्चित कराने के लिए आवश्यक या उचित समझता है।

 

350. भाषाई अल्पसंख्यक-वर्गों के लिए विशेष अधिकारी-

(1) भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के लिए एक विशेष अधिकारी होगा जिसे राष्ट्रपति नियुक्त करेगा।

(2) विशेष अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह इस संविधान के अधीन भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के लिए बंधित रक्षा उपाय से संबंधित सभी विषयों का अन्वेषण करें और उन विषयों के संबंध में ऐसे अंतराल ऊपर जो राष्ट्रपति निर्दिष्ट करें राष्ट्रपति को प्रतिवेदन दें और राष्ट्रपति ऐसे सभी प्रतिवेदन ओं को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रख पाएगा और संबंधित राज्यों की सरकारों को भिजवा आएगा।

 

351. हिन्दी भाषा के विकास के लिए निर्देश-

संघ का कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाएं उसका विकास करें जिससे वह भारत की सामाजिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त स्वरूप शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक यावल छलिया हो वहां उसके शब्द भंडार के लिए मुख्यता संस्कृत से और गौंण अन्य भाषाओं से ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करें।

 

हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में 14 सितंबर 1949 को स्वीकार किया गया। इसी स्मृति को ताजा रखने के लिए 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिंदी दिवस मनाया जाता है। राजभाषा अधिनियम सन 1963 में बना जबकि राजभाषा नियम 1976 में बनाए गए।

 

राजभाषा आयोग 1955

अनुच्छेद 344 की शक्तियों का प्रयोग करते हुए 7 जून 1955 को श्री बीजी खेर की अध्यक्षता में राजभाषा आयोग का गठन किया गया। आयोग में एक अध्यक्ष और 22 सदस्य होते हैं 22 सदस्य 22 भाषाओं से संबंधित होते हैं।

 

राजभाषा समिति 

राजभाषा अधिनियम 1963 के अनुसार राजभाषा समिति का गठन 1976 में किया गया राजभाषा के क्षेत्र में जहां सर्वोच्च अधिकार प्राप्त समिति है यह समिति केंद्र सरकार के अधीन आने वाले सभी संस्थानों का समय-समय पर निरीक्षण करती है और इसकी रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत करते हैं राष्ट्रपति इस रिपोर्ट को संसद के प्रत्येक सदन में रख पाते हैं और राज्यों को भिजवा ते हैं राजभाषा समिति में लोकसभा के 20 सदस्य तथा राज्यसभा के 10 सदस्य होते हैं जिन्हें एकल संक्रमणीय मत प्रणाली के द्वारा चुना जाता है।

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